Sunday, January 23, 2011

shoping on republic day



साहब झंडा लेलो
यूँ तो कीमत न है इस झंडे की
लेकिन फिर भी एक रुपया देदो

झंडे बेच रहा हूँ देश को नहीं
मेरी पुकार आपको चुभती तो नहीं
अब इस पे भी Discount न मांगना
एक रुपया खर्चा है तो याद रखना
तिरंगा ख़रीदा है , सजावट नहीं ,
साहब Republic Day है दिवाली नहीं
तिरंगे को अगले दिन फेकना नहीं !

देशभक्ति एक दिन में ख़तम हो जाए
तो इसी सड़क से गुजरना
इसी सिग्नल पे मिलूँगा
तिरंगा लौटा देना
और अपना रुपया लेजाना
साहब सिग्नल ग्रीन हो गया !

साहब झंडा लेलो
यूँ तो कीमत न है इस झंडे की
लेकिन फिर भी एक रुपया देदो !
-आज़म खान

Friday, December 24, 2010

एक बचपन का जमाना था खुशियों का खजाना था
चाहत चाँद को पाने की दिल तितली का दीवाना था
खबर थी सुबह की और नहीं शाम का ठिकाना था
थक कर आना स्कूल से और खेलने भी तो जाना था
दादी कहानियो में परियो का फ़साना था
बारिश में कागज की नाव थी हर मौसम सुहाना था
हर खेल में साथी थे हर रिश्ता निभाना था
गम की जुबान होती थी ही जख्मो का पैमाना था
रोने की वजह थी हसने का बहाना था
अब नहीं रही वो जिन्दगी वो बचपन का ज़माना था

Friday, October 8, 2010


कुछ खिलोने आज भी साथ है कुछ बचपना आज भी है

कुछ यादे आज भी साथ है कुछ दर्द आज भी दिल में है

कुछ दोस्त आज भी साथ है कुछ रिश्ते यूही टूटे जा रहे है

कुछ उम्र बढती जा रही है कुछ वक्त सख्त होते जा रहा है

कुछ बाते अनकही है जो आज भी दिल में चुभती जा रही है

कुछ ख़त लिखे है लेकिन कुछ पते खोते जा रहे है

कुछ बंधन खुल रहे कुछ में गांठ पड़ती जा रही है

कुछ तो खास था मेरे बचपन में जो अब खो गया है

कुछ भी तो नहीं इस जंहा में दादी की परियो का जंहा कंहा है

कुछ आंसू है आँखों में मेरी माँ का आंचल कंहा है

कुछ झरोखे तो है पर उनसे कुछ नज़र नहीं आता है

कुछ पल हसने के तो होते है लेकिन उनमे खुशिया कंहा है

कुछ खिलोने आज भी साथ है लेकिन खेलना नहीं आता है !

- आज़म खान

Wednesday, October 6, 2010

अब तो जागे !!


अब तो मैं और अप सिर्फ जागते है चाय और खबरों के साथ ,

जगे हो तो चलो पड़ोस के आंगन दो घर छोड़ने के बाद !!

एक लाश पड़ी है तिरंगे में आधी अधूरी कल के धमाके के बाद ,

वजह तो खबरों में मिली होगी ,शायद आंतकवाद या नक्सलवाद !!

मैं भूल जाऊंगा आप भूल जाएँगे गुजरते हुए वक्त के साथ ,

लेकिन अंधी माँ क्या करेगी टुकडो में बटी बेटे की लाश के साथ !!

कभी जो निकलो उस वीरान घर के आगे से एक अरसे के बाद ,

उसी गली में मिलेगी एक अंधी बूढी , पुराने सवाल के साथ ,

“कितने हुए थे उसके बेटे के टुकड़े उस धमाके के बाद ” ?

क्या जवाब देंगे पगली माँ को ,पढ़े लिखे रुसुक वाले है आप !

या निकल जाएँगे आगे नजरे चुराकर अपने मरे हुए जमीर के साथ ,

अब तो मैं और आप सिर्फ जागते है चाय और खबरों के साथ !!!!

- आज़म खान

Friday, October 1, 2010


खेल खेल में शायद देश का गौरव बढ़ ही जाना है,

क्यों है २ अक्टूबर की छुट्टी ,क्या किसी को याद न आना है !!!

मेहमानों की खिद्मित्दारी में राजधानी दिल्ली तो पस्त है,

बेईमानी और बटवारे की खबरों में बाकि जनता व्यस्त है !!!

हर दफ्तर में जिस तस्वीर पे सूखे फूलो का हार है,

सूख तो आँखों का पानी गया है जो देश का ये हाल है !!!

गोली और पत्थर से हर मुद्दे पर बहस होती है,

ऐसे में देश में अहिंसा दिवस की क्या अहमियत है!!!

जिन सत्य अहिंसा के सिद्धांतो से युवा घबराता है,

उन्ही को फ़िल्मी परदे पर मुन्ना सर्किट की जबानी अपनाता है !!!

ईश्वर अल्लाह तेरो नाम ये गीत अब कम सुनने में आता है,

इसीलिए तो अब भगवन भी भक्तो की सुनने से कतराता है !!!

रिश्वत की नोट गिनते हुए बापू तो याद आते नहीं हैं,

जब अनाज सड़ जाता है और गरीब भुखमरी से मर जाता है,

खेतो में क्रांति लाने वाले लाल बहादुर भी तो याद नहीं हैं,

इस बार भी २ अक्टूबर पे कुछ याद न आना है,

मस्ती में मस्त है देश , weekend जो मानना है !!!!

-आज़म खान



Sunday, September 26, 2010

Shahid Bhagat Singh

जूनून -ए -आज़ादी सबके खून में नहीं होती ,

यू शहादत को पाने की आरजू सब नहीं होती !

गरम खून का दावा तो हर जवान करता है ,

उबला ला सके लाखो में वो गर्मी सब में नहीं होती !

आजाद -ए -हिंद की आज़ादी की लड़ाई तो याद होगी आपको ,

फिर भगत सिंह की सालगिरह क्यों याद नहीं रहती !

यु तो जशन-ए -आज़ादी कई बार मनाई है ,

क्या कभी किसी को शहीद-ए-आज़म की याद आइ है !

जब भी लगे इंक़लाब का नारा ये शहीद याद रखना

यू तो जाने वाले वापस नहीं आते ,

पर हर इंक़लाब में भगत सिंह को जिन्दा करना !!!!!

-आज़म खान


Friday, September 24, 2010


पहली नजर में ही उनकी तस्वीर दिल में उतर गई ,

अब तो इश्क की सुरुआत जो हो गई !

मेरे गुलाबो को उनकी किताबो में जगह मिल गई ,

अब तो ये उनकी इजहारे मोहब्बत की अदा हो गई !

जिन राहो से तनहा गुजरते थे उनसे तन्हाई खो गई ,

अब तो ता उम्र साथ रहने की जुर्रत जो हो गई !

चलते चलते साथ में कई ख्वाहिसे जी गई ,

अब तो ख्वाबो में भी मिलने की इजाजत मिल गई !

हर जगह वो हमें दिखने लगे ये तो दीवानगी हो गई ,

अब तो फुर्सतो में भी मशरूफियत हो गई !

एक सुबह से शाम हो गई और वो हमे मिलना भूल गई ,

अब तो इंतजार की हद हो गई !

कई राते कई दिन गुजर गए कही वो बेवफा तो नहीं हो गई ,

अब तो दिल टूटना था कुछ खबर ऐसी मिल गई !

दुनिया की रिवायतो को निभाते हुए वो किसी और की हो गई ,

अब तो समझ अ गया क्यों ज़ारा वीर से जुदा हो गई !

वीर ज़ारा की तरह हमारी दास्ताँ भी सिर्फ अल्फाजो में सिमटी रह गई ,

अब तो सिर्फ कहानिया है सच्ची मोहब्बते जो ख़तम हो गई !!!